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Karaka Chaturthi Katha

Karwa Chauth Puja Vidhi & Muhurta 2015 in Hindi

करवा चौथ / करक चतुर्थी पूजा मुहूर्त-

करवा चौथ का त्यौहार हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष तृतीया को मनाया जाता है । इस वर्ष करवा चौथ 30 अक्टूबर 2015 शुक्रवार को मनाया जाएगा।  शुभ पूजा मुहुर्त चंद्रोदय के अनुसार अलग अलग स्थानों के लिए सुविधानुसार चयन करें.

धार्मिक महत्ता 

कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला करवा चौथ का त्यौहार सुहागिन स्त्रियों का त्यौहार है । इस त्योहार की मान्यता है कि जिस तरह से इस व्रत को विधि पूर्वक करने से  देवी करवा और वीरवती ने अपने पति के प्राणों को बचाकर अपने सुहाग की रक्षा की, उसी प्रकार जो भी इस व्रत को पूरे नियम के साथ करेगा उसका सुहाग अटल रहेगा ।

पूजा विधि-

प्रातः काल स्नान आदि करके स्त्रियाँ अपने पति की लम्बी आयु और परिवार की खुशहाली के लिए करवा चौथ का निर्जला व्रत करने का संकल्प इस मंत्र के साथ करें –

मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।

(इसका अर्थ है कि मैं यह करक चतुर्थी का व्रत पति , पुत्र और पोते की लम्बी उम्र तथा धन को स्थिर करने के लिए रख रही हूँ ।)

पूरे दिन सुहागिने निर्जला व्रत रखें फिर सूर्यास्त के बाद करवा चौथ पूजा मुहूर्त में पूजा करें। इसके लिए करवा चौथ कैलेंडर को दीवार पर टांग दें अथवा  चित्र को दीवार पर चावल के आटे के घोल से बनाये । एक चौकी पर जल से भरा लोटा एवं एक करवे में गेहूं भरकर रख दें। करवे के ऊपर एक ढक्कन में शक्कर का  बूरा, बिंदी और दक्षिणा आदि रख दें । करवे पर स्वस्तिक का चिन्ह बनायें ।  आठ पूरियों की अठावरी ,पुए और हलवा आदि भी बनाकर चौकी पर रख दें । फिर पीली मिट्टी से गौरी  बनायें  जिनकी गोद में गणपति को बैठायें ।  गौरी  को चौकी पर बिठाकर सभी सुहाग चिन्हों से उन्हें सजायें और उनकी पूजा करें।

गौरी पूजा में निरंतर इस मंत्र का जाप करें –

नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्‌। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥

पूजा के बाद गेंहूँ के १३ दाने हाथ में लेकर करवा चौथ की कथा सुने ।

व्रत कथा-

एक साहूकार के सात लड़के और एक लड़की थी। एक बार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को सेठानी सहित उसकी सातों बहुएं और उसकी बेटी ने भी करवा चौथ का व्रत रखा। रात्रि के समय जब साहूकार के सभी लड़के भोजन करने बैठे तो उन्होंने अपनी बहन से भी भोजन कर लेने को कहा । इस पर बहन ने कहा- भाई, अभी चांद नहीं निकला है । चांद के निकलने पर उसे अर्घ्य देकर ही आज मैं भोजन करूंगी । अपनी बहन के उत्तर को सुनकर साहूकार के बेटे नगर के बाहर चले गए और वहां अग्नि जला दी । फिर वापस घर आकर उन्होंने छलनी से प्रकाश दिखलाते हुए अपनी बहन से बोले- देखो बहन, चांद निकल आया है। अब तुम उन्हें अर्घ्य देकर भोजन ग्रहण करो। साहूकार की बेटी ने अपनी भाभियों से कहा- देखो, चांद निकल आया है, तुम लोग भी अर्घ्य देकर भोजन कर लो। ननद की बात सुनकर भाभियों ने कहा- बहन अभी चांद नहीं निकला है, तुम्हारे भाई धोखे से अग्नि जलाकर उसके प्रकाश को चांद के रूप में तुम्हें दिखा रहे हैं।

साहूकार की बेटी अपनी भाभियों की बात को अनसुनी करते हुए भाइयों द्वारा दिखाए गए चांद को अर्घ्य देकर भोजन कर लिया. इस प्रकार करवा चौथ का व्रत भंग करने के कारण विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश साहूकार की लड़की पर अप्रसन्न हो गए. गणेश जी की अप्रसन्नता के कारण उस लड़की का पति सख्त बीमार पड़ गया और घर में बचा हुआ सारा धन उसकी बीमारी में लग गया | साहूकार की बेटी को जब अपने किए हुए दोषों का पता लगा तो उसे बहुत पश्चाताप हुआ | उसने गणेश जी से क्षमा प्रार्थना की और फिर से विधि-विधान पूर्वक चतुर्थी का व्रत शुरू कर दिया |उसने उपस्थित सभी लोगों का श्रद्धानुसार आदर किया और तदुपरांत उनसे आशीर्वाद ग्रहण किया | इस प्रकार उस लड़की के श्रद्धा-भक्ति को देखकर एकदंत भगवान गणेश जी उसपर प्रसन्न हो गए और उसके पति को जीवनदान प्रदान किया. उसे सभी प्रकार के रोगों से मुक्त करके धन, संपत्ति और वैभव से युक्त कर दिया | कहते हैं इस प्रकार यदि कोई मनुष्य छल-कपट, अहंकार, लोभ, लालच को त्याग कर श्रद्धा और भक्तिभाव पूर्वक चतुर्थी का व्रत को पूर्ण करता है, तो वह जीवन में सभी प्रकार के दुखों और क्लेशों से मुक्त होता है और सौभाग्यशाली सुखमय जीवन व्यतीत करता है |

कथा सुनने के बाद अपनी सासु मां व घर की अन्य बड़ी सुहागन स्त्रियों से आशीर्वाद लें  व करवा सासु मां को अथवा किसी सुहागन अथवा ब्राम्हण स्त्री को दें ।

करवा दान करते समय इस मंत्र का जाप करें –

करकं क्षीरसम्पूर्णा तोयपूर्णमथापि वा। ददामि रत्नसंयुक्तं चिरञ्जीवतु मे पतिः॥

चाँद पूजा-

पूजा के पश्चात् सुहागिने चाँद के निकलने का इंतजार करें और चाँद के निकलते ही चाँद की पूजा करें फिर चाँद को अर्ध्य दें। अर्ध्य देने के बाद चलनी में से पहले चाँद फिर पति को देखें । फिर पति अपनी पत्नियों को फल का रस पिला कर उनका व्रत  तोड़ें ।

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करवा चौथ पूजा विधि

पूजा मुहूर्त- २०१४ 

करवा चौथ का त्यौहार हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक माह में कृष्णा पक्ष तृतीया को मनाया जाता है । इस वर्ष करवा चौथ ११ अक्टूबर २०१४ शनिवार को मनाया जाएगा ।करवा चौथ पूजा का मुहूर्त शाम १७:५२ से शाम १९:०७ बजे तक है और चाँद रात्रि २० बजकर १९ मिनट पर निकलेगा ।

धार्मिक महत्त्व-

कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला करवा चौथ का त्यौहार सुहागिन स्त्रियों का त्यौहार है । इस त्योहार की मान्यता है कि जिस तरह से इस व्रत को विधि पूर्वक करने से  देवी करवा और वीरवती ने अपने पति के प्राणों को बचाकर अपने सुहाग की रक्षा की उसी प्रकार जो भी इस व्रत को पूरे नियम के साथ करेगा उसका सुहाग बना रहेगा ।

पूजा विधि-

इस व्रत को करने की विधि इस प्रकार है –

प्रातः काल स्नान आदि  करके स्त्रियाँ अपने पति की लम्बी आयु और परिवार की खुशहाली के लिए करवा चौथ का निर्जला व्रत करने का संकल्प इस मंत्र के साथ करें –

“मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।”

(इसका अर्थ है कि मैं यह करक चतुर्थी का व्रत पति , पुत्र और पोते की लम्बी उम्र तथा धन को स्थिर करने के लिए रख रही हूँ ।)

पूरे दिन सुहागिने निर्जला व्रत रखें फिर सूर्यास्त के बाद करवा चौथ पूजा मुहूर्त में पूजा करें ।इसके लिए करवा चौथ कैलेंडर को दीवार पर टांग दें, या दिए हुए चित्र को दीवार पर चावल के आटे के घोल से बनाये । एक चौकी पर जल से भरा लोटा एवं एक करवे में गेहूं भरकर रख दें ।करवे के ऊपर एक ढक्कन में शक्कर का  बूरा, बिंदी और दक्षिणा आदि रख दें । करवे पर स्वस्तिक का चिन्ह बनायें ।  आठ पूरियों की अठावरी ,पुए और हलवा आदि भी बनाकर चौकी पर रख दें । फिर पीली मिट्टी से गौरी  बनायें  जिनकी गोद में गणपति को बैठायें ।  गौरी  को चौकी पर बिठाकर सभी सुहाग चिन्हों से उन्हें सजायें और उनकी पूजा करें । गौरी पूजा में निरंतर इस मंत्र का जाप करें –

“नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्‌। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥”

पूजा के बाद गेंहूँ के १३ दाने हाथ में लेकर करवा चौथ की कथा सुने ।

व्रत कथा-

एक साहूकार के सात लड़के और एक लड़की थी। एक बार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को सेठानी सहित उसकी सातों बहुएं और उसकी बेटी ने भी करवा चौथ का व्रत रखा। रात्रि के समय जब साहूकार के सभी लड़के भोजन करने बैठे तो उन्होंने अपनी बहन से भी भोजन कर लेने को कहा । इस पर बहन ने कहा- भाई, अभी चांद नहीं निकला है । चांद के निकलने पर उसे अर्घ्य देकर ही आज मैं भोजन करूंगी । अपनी बहन के उत्तर को सुनकर साहूकार के बेटे नगर के बाहर चले गए और वहां अग्नि जला दी । फिर वापस घर आकर उन्होंने छलनी से प्रकाश दिखलाते हुए अपनी बहन से बोले- देखो बहन, चांद निकल आया है। अब तुम उन्हें अर्घ्य देकर भोजन ग्रहण करो। साहूकार की बेटी ने अपनी भाभियों से कहा- देखो, चांद निकल आया है, तुम लोग भी अर्घ्य देकर भोजन कर लो। ननद की बात सुनकर भाभियों ने कहा- बहन अभी चांद नहीं निकला है, तुम्हारे भाई धोखे से अग्नि जलाकर उसके प्रकाश को चांद के रूप में तुम्हें दिखा रहे हैं।

साहूकार की बेटी अपनी भाभियों की बात को अनसुनी करते हुए भाइयों द्वारा दिखाए गए चांद को अर्घ्य देकर भोजन कर लिया. इस प्रकार करवा चौथ का व्रत भंग करने के कारण विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश साहूकार की लड़की पर अप्रसन्न हो गए. गणेश जी की अप्रसन्नता के कारण उस लड़की का पति सख्त बीमार पड़ गया और घर में बचा हुआ सारा धन उसकी बीमारी में लग गया. साहूकार की बेटी को जब अपने किए हुए दोषों का पता लगा तो उसे बहुत पश्चाताप हुआ. उसने गणेश जी से क्षमा प्रार्थना की और फिर से विधि-विधान पूर्वक चतुर्थी का व्रत शुरू कर दिया. उसने उपस्थित सभी लोगों का श्रद्धानुसार आदर किया और तदुपरांत उनसे आशीर्वाद ग्रहण किया. इस प्रकार उस लड़की के श्रद्धा-भक्ति को देखकर एकदंत भगवान गणेश जी उसपर प्रसन्न हो गए और उसके पति को जीवनदान प्रदान किया. उसे सभी प्रकार के रोगों से मुक्त करके धन, संपत्ति और वैभव से युक्त कर दिया. कहते हैं इस प्रकार यदि कोई मनुष्य छल-कपट, अहंकार, लोभ, लालच को त्याग कर श्रद्धा और भक्तिभाव पूर्वक चतुर्थी का व्रत को पूर्ण करता है, तो वह जीवन में सभी प्रकार के दुखों और क्लेशों से मुक्त होता है और सुखमय जीवन व्यतीत करता है

कथा के बाद अपनी सासु मां व घर की अन्य बड़ी सुहागन स्त्रियों से आशीर्वाद लें  व करवा सासु मां को अथवा किसी सुहागन अथवा ब्राम्हण स्त्री को दें । करवा दान करते समय इस मंत्र का जाप करें –

“करकं क्षीरसम्पूर्णा तोयपूर्णमथापि वा। ददामि रत्नसंयुक्तं चिरञ्जीवतु मे पतिः॥”

चाँद पूजा-

पूजा के पश्चात् सुहागिने चाँद के निकलने का इंतजार करें और चाँद के निकलते ही चाँद की पूजा करें फिर चाँद को अर्ध्य दें। अर्ध्य देने के बाद चलनी में से पहले चाँद फिर पति को देखें । फिर पति अपनी पत्नियों को जल व मीठा खिलाकर उनका व्रत  तोड़ें ।

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दिव्य वेबदैनिकी

हमारा उद्देश्य सर्व धर्म जनित कथाओं को सभी के साथ साझा करना है. हम सभी धर्मों को समान रूप से संकलित एवं मुद्रित करने के संकल्पित है.

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हिन्दू अवतार राम

संस्कृति की पहचान

संस्कृति की पहचान

( ०१ ) दो पक्ष-

कृष्ण पक्ष ,
शुक्ल पक्ष !

( ०२ ) तीन ऋण –

देव ऋण ,
पितृ ऋण ,
ऋषि ऋण !

( ०३ ) चार युग –

सतयुग ,
त्रेतायुग ,
द्वापरयुग ,
कलियुग !

( ०४ ) चार धाम –

द्वारिका ,
बद्रीनाथ ,
जगन्नाथ पुरी ,
रामेश्वरम धाम !

( ०५ ) चारपीठ –

शारदा पीठ ( द्वारिका )
ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम )
गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) ,
शृंगेरीपीठ !

( ०६ ) चार वेद

ऋग्वेद ,
अथर्वेद ,
यजुर्वेद ,
सामवेद !

( ०७ ) चार आश्रम –

ब्रह्मचर्य ,
गृहस्थ ,
वानप्रस्थ ,
संन्यास !

( ०८ ) चार अंतःकरण –

मन ,
बुद्धि ,
चित्त ,
अहंकार !

( ०९ ) पञ्च गव्य –

गाय का घी ,
दूध ,
दही ,
गोमूत्र ,
गोबर !

( १० ) पञ्च देव –

गणेश ,
विष्णु ,
शिव ,
देवी ,
सूर्य !

( ११ ) पंच तत्त्व –

पृथ्वी ,
जल ,
अग्नि ,
वायु ,
आकाश !

( १२ ) छह दर्शन –

वैशेषिक ,
न्याय ,
सांख्य ,
योग ,
पूर्व मिसांसा ,
दक्षिण मिसांसा !

( १३ ) सप्त ऋषि –

विश्वामित्र ,
जमदाग्नि ,
भरद्वाज ,
गौतम ,
अत्री ,
वशिष्ठ और कश्यप!

( १४ ) सप्त पुरी –

अयोध्या पुरी ,
मथुरा पुरी ,
माया पुरी ( हरिद्वार ) ,
काशी ,
कांची
( शिन कांची – विष्णु कांची ) ,
अवंतिका और
द्वारिका पुरी !

( १५ ) आठ योग –

यम ,
नियम ,
आसन ,
प्राणायाम ,
प्रत्याहार ,
धारणा ,
ध्यान एवं
समािध !

( १६ ) आठ लक्ष्मी –

आग्घ ,
विद्या ,
सौभाग्य ,
अमृत ,
काम ,
सत्य ,
भोग ,एवं
योग लक्ष्मी !

( १७ ) नव दुर्गा —

शैल पुत्री ,
ब्रह्मचारिणी ,
चंद्रघंटा ,
कुष्मांडा ,
स्कंदमाता ,
कात्यायिनी ,
कालरात्रि ,
महागौरी एवं
सिद्धिदात्री !

( १८ ) दस दिशाएं –

पूर्व ,
पश्चिम ,
उत्तर ,
दक्षिण ,
ईशान ,
नैऋत्य ,
वायव्य ,
अग्नि
आकाश एवं
पाताल !

( १९ ) मुख्य ११ अवतार –

मत्स्य ,
कच्छप ,
वराह ,
नरसिंह ,
वामन ,
परशुराम ,
श्री राम ,
कृष्ण ,
बलराम ,
बुद्ध ,
एवं कल्कि !

( २० ) बारह मास –

चैत्र ,
वैशाख ,
ज्येष्ठ ,
अषाढ ,
श्रावण ,
भाद्रपद ,
अश्विन ,
कार्तिक ,
मार्गशीर्ष ,
पौष ,
माघ ,
फागुन !

( २१ ) बारह राशी –

मेष ,
वृषभ ,
मिथुन ,
कर्क ,
सिंह ,
कन्या ,
तुला ,
वृश्चिक ,
धनु ,
मकर ,
कुंभ ,
कन्या !

( २२ ) बारह ज्योतिर्लिंग –

सोमनाथ ,
मल्लिकार्जुन ,
महाकाल ,
ओमकारेश्वर ,
बैजनाथ ,
रामेश्वरम ,
विश्वनाथ ,
त्र्यंबकेश्वर ,
केदारनाथ ,
घुष्नेश्वर ,
भीमाशंकर ,
नागेश्वर !

( २३ ) पंद्रह तिथियाँ –

प्रतिपदा ,
द्वितीय ,
तृतीय ,
चतुर्थी ,
पंचमी ,
षष्ठी ,
सप्तमी ,
अष्टमी ,
नवमी ,
दशमी ,
एकादशी ,
द्वादशी ,
त्रयोदशी ,
चतुर्दशी ,
पूर्णिमा ,
अमावास्या !

( २४ ) स्मृतियां –

मनु ,
विष्णु ,
अत्री ,
हारीत ,
याज्ञवल्क्य ,
उशना ,
अंगीरा ,
यम ,
आपस्तम्ब ,
सर्वत ,
कात्यायन ,
ब्रहस्पति ,
पराशर ,
व्यास ,
शांख्य ,
लिखित ,
दक्ष ,
शातातप ,
वशिष्ठ !

गुरु पूर्णिमा

गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए आषाढ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा पर्व मनाया जाता है। गुरु स्वयं पूर्णता का प्रतीक है अत: पूर्णिमा को उनकी पूजा का विधान स्वाभाविक है।

गुरु महिमा
गुरु’ शब्द दो अक्षरों ‘गु’ और ‘रु’ से से मिलकर बना है । ‘गु’ शब्द का अर्थ है- अंधकार तथा ‘रु’ का अर्थ है- प्रकाश। अर्थात्, अज्ञान स्वरूपी अन्धकार से प्रकाश रुपी ज्ञान का आत्मसार कराने वाले गुरु ही है|

गुरु के बारे मे गुणी जनो ने बहुत कुछ लिखा है और कहा है|
कबीर दास के मुख से :

गुरु गोबिंद दोउ खड़े , काके लागों पांय |
बलिहारी गुरु आपने , गोबिंद दियो बताय ||

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भारतीय संस्कृति में पुरातन काल से गुरुकुल की परंपरा रही है। गुरु को देवतुल्य पूज्य माना जाता रहा है। आचार्य देवोभव: का स्पष्ट अनुदेश भारत की परंपरा है। धार्मिक ग्रंथों में भी गुरु को भगवान से ऊपर स्थान दिया गया है।

व्रत एवं पूजा
प्रात:काल शांत चित्त से अपने गुरु का स्मरण करते हुए गुरु पूर्णिमा व्रत का संकल्प करें। गुरु के पास जाकर उनका अर्चन, वंदन और सम्मान करें। यदि गुरु दूर रहते हों , दिवंगत हों अथवा आप ईश्वर को अपना गुरु मानते हो तो उनके चित्र या पादुका को उच्च स्थान पर रखकर, लाल, पीला अथवा सफेद कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। गुरु के चित्र या पादुका का धूप, दीप, पुष्प, अक्षत, चंदन, नैवेद्य आदि से पूजन करें। गुरु स्तोत्र का पाठ करें और श्रद्धापूर्वक गुरु का स्मरण करें।

पौराणिक मान्यता
वेद व्यास ने वेद, उपनिषद और पुराणों का प्रणयन किया है। इसलिए वेद व्यास जी को समस्त मानव जाति का गुरु माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि वेद व्यास जी का जन्म भी इसी दिन हुआ था। इसलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

असुविधा के लिए खेद है|

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दिवाली पूजा विधि

दीपावली (श्री महालक्ष्मी पूजन) 

मुहुर्त (२३ अक्टूबर २०१४)

इस वर्ष २३ अक्टूबर २०१४ गुरुवार को अमावस प्रातः ०७ बजे से आरंभ हो रही है तथा २३ अक्टूबर गुरुवार को सम्पूर्ण दिन व रात्रि में अमावस्या रहेगी। उसके पश्चात शुक्रवार से प्रतिपदा आरंभ हो जायेगी। दीपावली पर्व रात्रि प्रधान पर्व है और पूजन के समय अमावस्या होनी चाहिये। इस वर्ष दीपावली २३ अक्टूबर २०१४ गुरुवार को होगी। हर व्यापारी का विशेष पूजा-अर्चना आवश्‍यक है।  महालक्ष्मी पूजा रात्रि में ही संपन्न होगी। अन्नकूट और गोवर्धन पूजा का पर्व २४ अक्टूबर को प्रशस्त होगा। यम द्वितीया १५ नवंबर को मनाया जायेगा।

दिवाली के दिन प्रदोषकाल से लेकर मध्यरात्रि के बीच श्री महालक्ष्मी पूजन,दीपमाला,मंत्र-जप-अनुष्ठनादि, श्रीगणेश पूजन,कलश षोडशमात्रिक, ग्रह पूजन एवम् भगवान श्रीविष्णु, भगवती लक्ष्मी सहित षोड़षोपचार पूजन, कुबेर पूजन चतुर्मुखी दीप प्रज्ज्वलित करना , जप ध्यानादि करने का विशेष महत्व रहता है। दीपावली को रात्रि जागरण करतेहुए श्रीविष्णु सहस्त्रनाम,श्रीलक्ष्मी सूक्त, श्रीसूक्त, पुरुषसूक्त आदि एवम् श्री रक्षाश्रोत का पाठ करना प्रशस्त होता है। अक्टूबर गुरुवार को सम्पूर्ण दिन व रात्रि में अमावस्या रहेगी। उसके पश्चात शुक्रवार से प्रतिपदा आरंभ हो जायेगी।

दीपावली पर्व रात्रि प्रधान पर्व है और पूजन के समय अमावस्या होनी चाहिये। इस वर्ष दीपावली २३ अक्टूबर २०१४गुरुवार को होगी। हर व्यापारी का विशेष पूजा-अर्चना आवश्‍यक गुरुवार की दिवाली मंत्रजप, सिद्धि एवम् तांत्रिक प्रयोगो के लिये विशेष रूप से सिद्धिदायी मानी जाती है। दीपावली की रात्रि में महालक्ष्मी पूजन के लिये स्थिर लग्न में पूजा साधना करने का विशेष महत्व है। दीपावली के दिन रात्रिकालीन लग्नों में केवल वृष तथा सिंह लग्न ही स्थिर लग्न है। वृष तथा सिंह लग्न के मध्य ही दीपावली पूजन करने से लक्ष्मीजी स्थिर रहती हैं अन्यथा लक्ष्मीजी अपने स्वभावानुसार चंचल हैं। व्यापारी वर्ग के लिये सिंह लग्न में महालक्ष्मी की स्तुति करना श्रेयस्कर है। इस पूजा के मुहूर्त में ही मंदिर में भी दीप प्रज्ज्वलित करके,स्थिर लग्नके मध्य हीं श्रीलक्ष्मी पूजन प्रारंभ करें। इस मुहूर्त में दीपदान,श्रीमहालक्ष्मी पूजन व श्रीगणेश पूजन,कुबेर पूजन, बही-खाता पूजन, धर्म एवम् गृह स्थलो पर दीप प्रज्जवलित करना,ब्राह्मणों तथा अपने आश्रितों को भेंट, मिष्ठनादि बांटना शुभ होता है। इस अवधि में श्रीमहालक्ष्मी पूजन, महाकाली पूजन,कुबेरादि पूजन, श्रीसूक्त, लक्ष्मीसूक्त पुरुषसूक्त तथा अन्य मंत्रों की साधना जापनुष्ठान करना सिद्धि प्रदायक होता है।सभी वर्ग के लोग चाहे वह व्यापारी हों, नौकरी-पेशा अथवा अन्य कार्य मे संलग्न हों, उन्हे सुख-समृधि की कामना होती है। अतः सभी को प्रत्येक वर्ष दीपावली की रात्रि को शुभ-लग्न मुहूर्त में परिवार के साथ बैठकर लक्ष्मीजी को घर में स्थिर करने के लिये लक्ष्मीजी से सम्बंधित कोई ना कोई साधना अवश्य ही संपन्न करना चाहिये क्यूंकि लक्ष्मीजी हीं जीवन को स्थिरता देने वाली, आत्म-विश्वास प्रदान करने वाली एवम् सांसारिक दुखों को दूर करने दीपावली के दिन इस साधना में रुचि रखने वाले प्रत्येक साधक को लक्ष्मी साधना का फल अवश्य मिलता है। दिन में लक्ष्मी साधना उचित नहीं है इसीलिये गोधूलि बेला के पश्चात स्थिर लग्न में ही साधना करना उचित है।

शास्त्रों में धन त्रयोदशी को ‘कुबेर साधना दिवस’ माना गया है और इस दिन श्री यक्षराज कुबेर की पूजा करने का विशेष विधान है। कुबेर, लक्ष्मीजी के सेवक-द्वारपाल, खजाने के रक्षक देव है , इनकी कृपा से हीं लक्ष्मी का आगमन होता है। अतः त्रयोदशी के दिन विधि-विधान सहित कुबेर पूजा संपन्न करनी चाहिये। इस वर्ष धन-त्रयोदशी २१ अक्टूबर मंगलवार उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में है।

पूजन के लिये शुभ मुहूर्त सायंकाल 07:05 से 06:55 बजे तक का है, कि पूजा शुभ मुहूर्त में करना लाभप्रद होता है।  इस हेतु साधक अपने पूजा स्थान को पहले से हीं साफ-सुथरा कर लें, और उस स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर , सुगंध युक्त गुलाब के फूलों से सजा कर पीला वस्त्र बिछा दें और कुबेर यंत्र स्थापित कर दें। कुबेर यंत्र के चारों ओर चार ‘लघु नारियल’ स्थापित कर चावल,कुमकुम, नैवेद्य आदि से पूजन करें और उसके सामने ही सिक्का – रुपये इत्यादि रखें और तत्पश्चात कुबेर यंत्र की तीन माला का जप चंदन की 108 दाने की माला से करें।

कुबेर मंत्र – ऊँ श्रीं ऊँ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः ।

कुबेर मंत्र का जाप करने के पश्चात इस अवसर पर साधक को अपनी इच्छा तथा श्रद्धा के अनुसार अवश्य करना दीपावली दिवस नये कार्यों को प्रारंभ करने , नये विचारों को क्रिया रूप देने , नये संकल्प लेने का दिवस है। इस दिन प्रातः से हीं साधक को प्रसन्न मन से परिवार के सदस्यों सहित शुभ कार्य प्रारंभ करना चाहिये। परिवार की आर्थिक उन्नति हेतु चिंतन करना चाहिये। इस दिन प्रातः अपने व्यापार स्थल पर सफाई कर नये वस्त्र- गद्दी तथा  दीपावली के दिन महालक्ष्मी का पूजन केवल ‘स्थिर लग्न’ में हीं संपन्न किया जाना चाहिये। अमावस्या की रात्रि को वृषभ और सिंह मात्र दो स्थिर लग्न आते हैं, अतः इन लग्न-मुहूर्त में ही लक्ष्मी पूजन संपन्न होना चाहिये। इस वर्ष 2014 में ‘वृषभ लग्न’ दीपावली के दिन ‘सायंकाल’ 6:58 to 8:52 PM तक पड़ता है। तथा सिंह लग्न मध्य रात्रि को 01:28 to 03:44 AM तक पड़ता है परंतु 03:26 पर अमावश्या तिथि समाप्त होने के वजह से सिंह लग्न मे पूजा 01:28 से 03:25 AM तक ही श्रेयस्कर है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इन दोनों लग्नों का यह समय उत्तर भारत का है। विभिन्न प्रांतो के अनुसार समय सारणी संलग्न है।

व्यवसाय में रत व्यक्तियो के लिये वृषभ लग्न से अधिक उत्तम ‘सिंह लग्न’ का मुहूर्त है। दीपावली के दिन प्रातः उठ कर स्नान इत्यादि से निवृत होकर 1 मिट्टी के दीपक में ‘अभिमंत्रित पूजा का सिन्दूर’ और शुद्ध गीयी मिलकर लेप बनाएं और पूजा स्थान में स्वस्तिक का चिन्ह अंकित करें। साथ हीं ‘शुभ-लाभ’, ‘श्री महालक्ष्मैः नमः’, ‘श्री कुबेराय नमः’ आदि मांगलिक चिन्ह अंकित करें। घर के मुख्य द्वार पर आम या अशोक वृक्ष के पत्तों से सजावट कर तोरण द्वार बनाएं तथा एक बड़े ताम्र कलश मे गृह लक्ष्मी जल भर उस पर कुमकुम आदि से स्वास्तिक चिन्ह अंकित करें तथा इस कलश पर थोड़े चावल, एक काली हल्दी की गाँठ, गूंजा के पांच बीज एक पीले कपड़े मे बांध कर रख दें।

रात्रि कालीन दीपावली पूजन हेतु साधक को पूजन सामग्री आदि की व्यवस्था पहले ही कर लेनी चाहिये। पूजन हेतु निम्न वस्तुएं आवश्यक हैं – चावल, नारियल, हल्दी का चूर्ण, धूप, दीप, केपर, दूध की मिठाई, मौसम के फल, पीले पुष्‍प, कोरे पान के पांच पत्ते, 5 सुपारियां, मौली, दूध, दही, घी, मधु,शक्कर, गुड, स्वेत वस्त्र, शुद्ध जल, कलश, चांदी का सिक्का , सिन्दूर, रूई, कलम, बही-खाते, गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति अथवा चित्र,खील, बतासे, 108 दाने की कमल गट्टे की माला, हल्दी की माला, 5 पीले कौड़ी, 1 तामपत्र पर अंकित प्रतिष्ठित श्रीयंत्र।

यह साधना विधान सभी प्रकार के साधको के लिये उपयोगी है और प्रत्येक साधक को अपने पूरे परिवार सहित प्रसन्न मन से वृषभ लग्न अथवा सिंह लग्न मे लक्ष्मी जी का पूजन अवश्य करना चाहिये। सर्वप्रथम जिस स्थान पर लक्ष्मी पूजा करना हो, उस स्थान को सॉफ कर जल से धो दें, फिर लकड़ी की चौकी रखकर उसपर पीला वस्त्र बिछाकर सामने लक्ष्मी-गणेश चित्र अथवा प्रतिमा के अतिरिक्त ‘ताम्रपात्र पर अंकित श्रीयंत्र’ एक अलग पात्र के बीचो-बीच स्थापित कर दें। एक दूसरी थाली में चांदी के सिक्के आभूषण इत्यादि रखें। श्रीयंत्र के सामने ‘पांच पीली कौड़ी’ स्थापित करें, श्रीयंत्र के चारों ओर घेरे के रूप मे 108 दाने की कमल बीजों की (कमल गट्टे की) माला को स्थापित करें तथा लक्ष्मी के चरणों में शुद्ध मधु रखें । व्यापारी सर्वप्रथम अपने बही-खाते को खोल कर तीसरे पृष्ठ पर अभिमंत्रित पूजा के सिन्दूर से स्वस्तिक बनाएं और ‘शुभ-लाभ’ ‘श्री गणेशाय नमः’ लिखें।  चौकी पर बीचों-बीच चांदी की लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित कर परस ही एक ताम्र कलश मे आधा जल भर कर 1 पानी वाला साबुत नारियल और कलावा बांधकर स्थापित करें। तथा अब विधि-विधान सहित पूजा प्रारंभ करें – इस समय अन्य सामग्री को थाली में रख कर साधक, सुन्दर शुद्ध वस्त्र पहन कर अपनी गृह लक्ष्मी के साथ पूजा में बैठें, सर्वप्रथम गणेश पूजा की जाती है, इस हेतु गणेश चित्र , मूर्ति के सम्मुख घी का दीपक जलावें। साथ हीं अगरबत्ती भी, अब  हाथ जोड़ कर गणपति का आवाहन करें और यह प्रार्थना करें, कि – हे देव ! आप रिद्धि-सिद्धि सहित मेरे घर पधारें और मेरी पूजा तथा अन्य कार्य सफल हो। तीन माला हल्दी क़ी 108 दाने क़ी माला से गणपति बीज़ मंत्र का जप करें – ओउम गं गणपतये नमः ।

तत्पश्चतात भगवती लक्ष्मी का ध्यान स्तुति द्वारा आवाहन करें – महालक्ष्मी ध्यान स्तुति

ऊँ कान्त्या कांचन सत्रिमों हिमगिरी प्रख्यैश्चतुर्भिर्गर्जे: ।
हंस्तोत्क्षिप्त हिरन्मया मृत घटे:, रासीच्या मानं श्रियं । ।
विभ्राणां वरमब्ज युग्मायं हस्तैः किरीटोज्ज्वलां ।
क्षोमाबद्ध  नितम्बबिम्बलसितांवन्देडार्विन्द स्थिरताम । ।

इसके बाद हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि हे महालक्ष्मी ! आप अपनी सभी शक्तियां सहित मेरे घर में स्थान ग्रहण करें , मैं अपने सब क्लेश , दुःख , दारिद्रय , भय , पीड़ा, निवारण हेतु तथा सर्व कार्य सिद्धि हेतु आपका यह पूजन संपन्न कर रहा हूं। इसी के साथ ही पुनः हाथ में जल लें और अपना नाम , गोत्र आदि का उच्चारण करते हुए यह संकल्प करें कि मैं इस अमुक दिन अपने पूरे परिवार सहित महागणपति और महालक्ष्मी का पूजन कर रहा हूँ। सभी देवता साक्षी हैं और मेरे कार्यों में सहयोगी हों, यह कह कर जल छोड़ दें। तत्पश्चात कलश पर स्वास्तिक का चिन्ह बनाएं, उस पर चावल , मौली, अर्पित करें तथा वरुण देव का आह्वाहन करते हुए उन्हें नमस्कार करें। अपने बाएं हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ में पुष्प लेकर जल को सभी पूजा सामग्री पर महालक्ष्मी पूजन प्रारम्भ करें। अगरबत्ती, घी का दीपक , तेल का दीपक इत्यादि प्रज्जवलित कर दें , शुद्ध शांत मन से लक्ष्मी का आह्वाहन करते हुए , ध्यान करते हुए अपने आप को पूर्ण रूप से समर्पित करते हुए सर्वप्रथम आसान के लिए यदि उपलब्ध हो तो कमल पुष्प समर्पित करें अथवा कोई भी पुष्प समर्पित करें। फिर हाथ में जल लेकर लक्ष्मी जी को जल अर्पित करें। फिर पुनः शुद्ध जल लेकर श्री महालक्ष्मी श्री यन्त्र को शुद्ध जल से , पंचामृत से, फिर पुनः शुद्ध जल से स्नान करा कर चौकी के बीचों-बीच स्थापित करें और सर्वप्रथम मौली (कलावा) समर्पित करें , फिर अबीर , गुलाल, कुमकुम , केसर आदि चढ़ाएं , उसके पश्चात पुष्प , सुपारी, पंचामृत अर्थात एक पात्र में घी , दूध , दही , शहद , शक्कर मिला कर अर्पित करें। इसके पश्चात सिन्दूर विशेष रूप से अर्पित करें, यह सौभाग्य द्रव्य है , इसके साथ ही काजल , हल्दी तथा कुमकुम भी चढ़ाएं और सामने ही पांच पीली कौड़ी भी स्थापित करें और फिर हाथ जोड़कर यह प्रार्थना करें कि मेरे घर-परिवार में हर समय सुख, सौभाग्य बना रहे ,इसके साथ hi नैवेद्य अर्पित करें , तत्पश्चात इन पर पुष्प अर्पित कर निम्न मंत्र का २१(इक्कीस) बार

ऊँ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सिद्ध लक्ष्म्यै: नमः ।

लक्ष्मी जी के सामने स्थापित पांच पीली कौड़ी पंचलक्ष्मियों के – सिद्ध लक्ष्मी , ज्येष्ठा लक्ष्मी , वसुधा लक्ष्मी , नीलश्म लक्ष्मी, त्रिपुर सुंदरी लक्ष्मी जी का प्रतीक है , इन्हे पूजन कर कुमकुम , केसर , चावल , पुष्प अर्पित करें और लक्ष्मी बीज मन्त्र का जप करें। प्रत्येक शक्ति के सामने कमलगट्टे की 108 दाने की माला से लक्ष्मी बीज मंत्र का १ माला जप करते हुए , एक पुष्प. अर्पित

ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ऊँ महालक्ष्म्यै नमः

प्रत्येक माला जप के साथ एक पुष्प अर्पित करना अनिवार्य है, इस प्रकार पांचों लक्ष्मी स्वरूपों का पूर्ण पूजन करने के पश्चात महा लक्ष्मी जी की आरती संपन्न करें और नमस्कार एवं अपने अपराधों की क्षमा मांगते हुए देवी के अपने घर में स्थायी आवास की प्रार्थना करते हुए प्रसाद ग्रहण करें और अपने परिवार को भी मिष्ठान्न इत्यादि वितरित करें।

विशेष – लक्ष्मी जी से सम्बंधित बीज मंत्र तथा अन्य सभी मंत्रो का जप कमलगट्टे की माला से ही संपन्न किया जाना चाहिए। अन्य प्रकार की माला का प्रयोग वर्जित है। पूरी रात्रि दीपक जलते रहना चाहिए तथा पूजन सामग्री को वहां से ना हटायें। दूसरे दिन प्रातः काल सूर्योदय के समय श्रीयंत्र को अपने पूजा स्थान में स्थापित करें। अन्य सारी सामग्री को एक पीले वस्त्र में बांधकर रख दें तथा कार्तिक पूर्णिमा को इसे पीपल वृक्ष में अथवा बहते जल में समर्पित कर दें।

” आरती श्री गणेश जी की “

जय गणेश , जय गणेश , जय गणेश देवा। माता जाकि पार्वती, पिता महादेवा। । जय । ।
पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा। लड्डुअन का भोग लगे, संत करे सेवा। । जय । ।
एकदन्त दयावन्त , चार भुजा धारी। मस्तक सिन्दूर सोहे , मूसे की सवारी। । जय । ।
अंधन को आँख देत , कोढ़िन को काया। बांझन को पुत्र देत , निर्धन को माया। । जय । ।
सूरश्याम शरण आये , सुफल कीजे सेवा। हम सब शरण में आये दर्शन दीजे देवा। । जय। ।
दीनन की लाज रखो , शम्भू – सुत वारी। कामना को पूरी करो जाऊं बलिहारी। । जय । ।

आरती श्री लक्ष्मी जी की

ऊँ जय लक्ष्मी माता , मैया जय लक्ष्मी माता। तुमको निशदिन सेवत , हर विष्णु धाता । । ऊँ जय.. ।।
उमा , रमा , ब्रह्माणी , तुम ही जग – माता। सूर्य चन्द्रमा ध्यावत , नारद ऋषि जाता। । ऊँ जय.. ।।
दुर्गा रूप निरंजनि , सुख संपत्ति दाता। जो कोई तुमको ध्यावत , ऋद्धि पाता । । ऊँ जय.. ।।
तुम पाताल निवासिनी , तुम ही शुभ दाता। कर्म-प्रभाव प्रकाशिनि , भवनिधि की त्राता । । ऊँ जय.. ।।
जिस घर में तुम रहती , तहें सद्गुण आता। सब संभव हो जाता , मन नहीं घबराता । । ऊँ जय.. ।।
तुम बिन यज्ञ ना होते , व्रत ना हो पाता। खान – पान का वैभव , सब तुमसे आता । । ऊँ जय.. ।।
शुभ-गुण-मंदिर सुन्दर , क्षीरोदधि – जाता। रतन चतुर्दश तुम बिन , कोई नहीं पाता । । ऊँ जय.. ।।
महालक्ष्मी जी की आरती , जो कोई जन जाता। उर आनंद समाता , पाप उतर जाता । । ऊँ जय.. ।।

आरती श्री जगदीश जी की

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे | भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे ||ॐ जय.. ||
जो ध्यावे फल पावे, दुःखबिन से मन का | सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का ||ॐ जय.. ||
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी | तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी ||ॐ जय.. ||
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी | पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी ||ॐ जय.. ||
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता | मैं मूरख फलकामी, कृपा करो भर्ता || ॐ जय.. ||
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति | किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति ||ॐ जय.. ||
दीन-बन्धु दुःख-हर्ता, ठाकुर तुम मेरे | अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे ||ॐ जय.. ||
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा | श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा ||ॐ जय.. ||
तन , मन , धन सब कुछ है तेरा। तेरा तुझको अर्पण , क्या लागे मेरा ||ॐ जय.. ||

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